शनिवार, 2 अप्रैल 2016

धर्म : स्वरुप, परिभाषा और लक्षण


विद्वानों का मत है कि धर्म वह है जो हमें आदर्श जीवन जीने की कला और मार्ग बताता है। केवल पूजा-पाठ या कर्मकांड ही धर्म नहीं है। धर्म मानव जीवन को एक दिशा देता है। विभिन्न पंथों, मतों और संप्रदायों द्वारा जो नियम, मनुष्य को अच्छे जीवन यापन, जिसमें सबके लिए प्रेम, करूणा, अहिंसा, क्षमा और अपनत्व का भाव हो, ऐसे सभी नियम धर्म के तहत माने गए हैं।

परिभाषा : 

धारणाद्धर्ममित्याहुः धर्मो धारयते प्रजाः।
यत्स्याद्धारणसंयुक्तं स धर्म इति निश्चयः॥

धर्म शब्द संस्कृत की 'धृ' धातु से बना है, जिसका तात्पर्य है धारण करना, आलंबन देना, पालन करना। इस प्रकार धर्म का स्पष्ट शब्दों में अर्थ है :
धारण करने योग्य आचरण धर्म है। सही और गलत की पहचान कराकर प्राणिमात्र को सदमार्ग पर चलने के लिए अग्रसर करे, वह धर्म है। जो हमारे जीवन में अनुशासन लाये वह धर्म है। आदर्श अनुशासन वह जिसमें व्यक्ति की विचारधारा और जीवनशैली सकारात्मक हो जाती है। जब तक किसी भी व्यक्ति की सोच सकारात्मक नहीं होगी, धर्म उसे प्राप्त नहीं हो सकता है।
वास्तव में, धर्म ही मनुष्य की शक्ति है, धर्म ही मनुष्य का सच्चा शिक्षक है। धर्म के बिना मनुष्य अधूरा है, अपूर्ण है।


धर्म के लक्षण :

मनुस्मृति के अनुसार धर्म के 10 लक्षण होते है जो कि निम्न प्रकार है-
धृतिः क्षमा दमोस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥
अर्थात-
धैर्य, क्षमा, संयम, अस्तेय, पवित्रता, इन्द्रिय निग्रह, धी या बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना- ये धर्म के दस लक्षण कहलाते है।


धैर्य : धन संपत्ति, यश एवं वैभव आदि का नाश होने पर धीरज बनाए रखना तथा कोई कष्ट, कठिनाई या रूकावट आने पर निराश न होना।

क्षमा : दूसरो के दुव्र्यवहार और अपराध को लेना तथा क्रोश न करते हुए बदले की भावना न रखना ही क्षमा है।

दम : मन की स्वच्छंदता को रोकना। बुराइयों के वातावरण में तथा कुसंगति में भी अपने आप को पवित्र बनाए रखना एवं मन को मनमानी करने से रोकना ही दम है।

अस्तेय : अपरिग्रह- किसी अन्य की वस्तु या अमानत को पाने की चाह न रखना। अन्याय से किसी के धन, संपत्ति और अधिकार का हरण न करना ही अस्तेय है।

पवित्रता (शौच) : शरीर को बाहर और भीतर से पूर्णत: पवित्र रखना, आहार और विहार में पूरी शुद्धता एवं पवित्रता का ध्यान रखना।

इन्द्रिय निग्रह : पांचों इंद्रियों को सांसारिक विषय वासनाओं एवं सुख-भोगों में डूबने, प्रवृत्त होने या आसक्त होने से रोकना ही इंद्रिय निगह है।

धी : भलीभांति समझना। शास्त्रों के गूढ़-गंभीर अर्थ को समझना आत्मनिष्ठ बुद्धि को प्राप्त करना। प्रतिपक्ष के संशय को दूर करना।

विद्या : आत्मा-परमात्मा विषयक ज्ञान, जीवन के रहस्य और उद्देश्य को समझना। जीवन जीते की सच्ची कला ही विद्या है।

सत्य : मन, कर्म, वचन से पूर्णत: सत्य का आचरण करना। अवास्तविक, परिवर्तित एवं बदले हुए रूप में किसी, बात, घटना या प्रसंग का वर्णन करना या बोलना ही सत्याचरण है।

आक्रोश : दुव्र्यवहार एवं दुराचार के लिए किसी को माफ करने पर भी यदि उसका व्यवहार न बदले तब भी क्रोध न करना। अपनी इच्छा और योजना में बाधा पहुंचाने वाले पर भी क्रोध न करना। हर स्थिति में क्रोध का शमन करने का हर संभव प्रयास करना।

धर्म का स्वरुप :


धर्म अनुभूति की वस्तु है। वह मुख की बात मतवाद अथवा युक्तिमूलक कल्पना मात्र नहीं है। आत्मा की ब्रह्मस्वरूपता को जान लेना, तद्रुप हो जाना- उसका साक्षात्कार करना, यही धर्म है- वह केवल सुनने या मान लेने की चीज नहीं है। समस्त मन-प्राण का विश्वास की वस्तु के साथ एक हो जाना - यही धर्म है।
( स्वामी विवेकानंद)

वेदों एवं शास्त्रों के मुताबिक धर्म में उत्तम आचरण के निश्चित और व्यवहारिक नियम है -

1. ''आ प्रा रजांसि दिव्यानि पार्थिवा श्लोकं देव: कृणुते स्वाय धर्मणे। (ऋग्वेद - 4.5.3.3) 
''धर्मणा मित्रावरुणा विपश्चिता व्रता रक्षेते असुरस्य मायया। 
(ऋग्वेद - 5.63.7)
यहाँ पर 'धर्म' का अर्थ निश्चित नियम (व्यवस्था या सिद्धान्त) या आचार नियम है

2. अभयं सत्वसशुद्धिज्ञार्नयोगव्यवस्थिति:।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाधायायस्तप आर्जवम्।।
अहिंसा सत्यमक्रोधत्याग: शांतिर पैशुनम्।
दया भूतष्य लोलुप्तवं मार्दवं ह्रीरचापलम्।। 
तेज: क्षमा धृति: शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत।। (गीता : 16/1, 2, 3)
अर्थात - भय रहित मन की निर्मलता, दृढ मानसिकता, स्वार्थरहित दान, इन्द्रियों पर नियंत्रण, देवता और गुरुजनों की पूजा, यश जैसे उत्तम कार्य, वेद शास्त्रों का अभ्यास, भगवान के नाम और गुणों का कीर्तन, स्वधर्म पालन के लिए कष्ट सहना, व्यक्तित्व, मन, वाणी तथा शरीर से किसी को कष्ट न देना, सच्ची और प्रिय वाणी, किसी भी स्थिति में क्रोध न करना, अभिमान का त्याग, मन पर नियंत्रण, निंदा न करना, सबके प्रति दया, कोमलता, समाज और शास्त्रों के अनुरूप आचरण, तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, शत्रुभाव नही रखना - यह सब धर्म सम्मत गुण व्यक्तित्व को देवता बना देते है। धर्म का मर्म और उसकी व्यापकता को स्पष्ट करते हुए गंगापुत्र भीष्म कहते है-

3. सर्वत्र विहितो धर्म: स्वग्र्य: सत्यफलं तप:।
बहुद्वारस्य धर्मस्य नेहास्ति विफला क्रिया।।
(महाभारत शांतिपर्व - 174/2)
अर्थात - धर्म अदृश्य फल देने वाला होता है। जब हम धर्ममय आचरण करते हैं तो चाहे हमें उसका फल तत्काल दिखाई नहीं दे, किन्तु समय आने पर उसका प्रभाव सामने आता है। सत्य को जानने (तप) का फल, मरण के पूर्व(ज्ञान रूप में) मिलता है। जब हम धर्म आचरण करते है तो कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ता है किन्तु ये कठिनाइयां हमारे ज्ञान और समझ को बढाती है। धर्म के कई द्वार हैं। जिनसे वह अपनी अभिव्यक्ति करता है। धर्ममय आचरण करने पर धर्म का स्वरुप हमें समझ में आने लगता है, तब हम अपने कर्मो को ध्यान से देखते है और अधर्म से बचते है।
धर्म की कोई भी क्रिया विफल नही होती, धर्म का कोई भी अनुष्ठान व्यर्थ नही जाता। महाभारत के इस उपदेश पर हमेशा विश्वास करना चाहिए और सदैव धर्म का आचरण करना चाहिए।

श्रीरामायण में धर्म :
वाल्मिकी रामायण में (3/37/13) भगवान श्रीराम को धर्म की जीवंत प्रतिमा कहा गया है। श्रीराम कभी धर्म को नहीं छोड़ते और धर्म उनसे कभी अलग नहीं होता है। (युद्ध कांड 28/19) श्रीरामचन्द्र जी के अनुसार, संसार में धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है। धर्म में ही सत्य की प्रतिष्ठा है। धर्म का पालन करने वाले को माता-पिता, ब्राह्मण एवं गुरु के वचनों का पालन अवश्य करना चाहिए।यथा:-
यस्मिस्तु सर्वे स्वरसंनिविष्टा धर्मो, यतः स्यात् तदुपक्रमेत।
द्रेष्यो भवत्यर्थपरो हि लोके, कामात्मता खल्वपि न प्रशस्ता॥
(श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण 2/21/58)
अर्थात- जिस कर्म में धर्म आदि पुरुषार्थों का समावेश नहीं, उसको नहीं करना चाहिए। जिससे धर्म की सिद्धि होती हो वहीं कार्य करें। जो केवल धन कमाने के लिए कार्य करता है, वह संसार में सबके द्वेष का पात्र बन जाता है। यानि उससे, उसके अपने ही जलने लगते हैं। धर्म विरूद्ध कार्य करना घोर निंदनीय है।

इसी तरह देवी सीता भी धर्म के पालन का ही आवश्यक मानती हुऐ कहती हैं-
धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात् प्रभवते सुखम्।
धर्मेण लभते सर्व धर्मसारमिदं जगत्॥
(श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण 3/9/30)
अर्थात- देवी सीता के कहने का मतलब यह हे कि धर्म से अर्थ प्राप्त होता है और धर्म से ही सुख मिलता है। और धर्म से ही मनुष्य सर्वस्व प्राप्त कर लेता है। इस संसार में धर्म ही सार है। यह बात देवी सीता ने उस समय कही जब श्रीराम वन में मुनिवेश धारण करने के बावजूद शस्त्र साथ में रखना चाहते थे। वाल्मिकी रामायण में देवी सीता के माध्यम से पुत्री धर्म, पत्नी धर्म और माता धर्म मुखरित हुआ है।
यही कारण है कि देवी सीता भारतीय नारी का आदर्श स्वरुप है।

धर्म वास्तव में क्या है :
धर्म ईश्वर प्रदत होता है व्यक्ति विशेष द्वारा चलाया हुआ नही । क्योकि व्यक्ति विशेष द्वारा चलाया हुआ 'मत' (विचार) होता है अर्थात उस व्यक्ति को जो सही लगा वो उसने लोगो के समक्ष प्रस्तुत किया और श्रद्धापूर्वक अथवा बलपूर्वक अपना विचार (मत) स्वीकार करवाया।
आज धर्म की बहुत सी शाखाएं हो गयी है किन्तु ये सभी 'मजहब' कहलाते है। इन्ही का नाम मत है, मतान्तर है, पंथ है , रिलिजन है।  ये धर्म नही हो सकते ।

ईश्वरीय धर्म में ये खूबी है की ये समग्र मानव जाती के लिए है और सामान है जैसे सूर्य का प्रकाश , जल  , प्रकृति प्रदत खाद्य पदार्थ आदि ईश्वर कृत है और सभी के लिए है । उसी प्रकार धर्म (धारण करने योग्य) भी सभी मानव के लिए सामान है । यही कारण है की वेदों में यह कहा गया है -
# वसुधैव कुटुम्बकम्
अर्थात - सारी धरती को अपना घर समझो,
# सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्॥
अर्थात - सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें, और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पडे।

उपरोक्त मजहबो में यदि उस मजहब के जन्मदाता को हटा दिया जाये तो उस मजहब का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा । इस कारण ये अनित्य है और जो अनित्य है वो धर्म कदापि नही हो सकता किन्तु सनातन वैदिक (हिन्दू) धर्म में से आप कृष्ण जी को हटायें, राम जी को हटायें तो भी सनातन धर्म पर कोई असर नही पड़ेगा क्यूकी वैदिक धर्म इनके जन्म से पूर्व भी था, इनके समय भी था और आज इनके पश्चात भी है  अर्थात वैदिक धर्म का करता कोई भी देहधारी नही। यही नित्य है।

भारत का सर्वप्रमुख धर्म हिन्दू धर्म है, जिसे इसकी प्राचीनता एवं विशालता के कारण 'सनातन धर्म' भी कहा जाता है। अन्य धर्मों के समान हिन्दू धर्म किसी पैगम्बर या व्यक्ति विशेष द्वारा स्थापित धर्म नहीं है, बल्कि यह प्राचीन काल से चले आ रहे विभिन्न धर्मों, मत-मतांतरों, आस्थाओं एवं विश्वासों का समुच्चय है।

सनातन धर्म को यदि एक पंक्ति में कहना हो तो यही कहा जाएगा - जियो और जीने दो। भारतीय सनातन परपंरा की यही विशेषता भारत को 'विश्व गुरु' बनाती है।

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तवयः मानो धर्मो हतोवाधीत्॥ 
(मनु स्मृति)
अर्थात -
धर्म उसका नाश करता है जो उसका (धर्म का ) नाश करता है | धर्म उसका रक्षण करता है जो उसके रक्षणार्थ प्रयास करता है | अतः धर्मका नाश नहीं करना चाहिए | ध्यान रहे धर्मका नाश करनेवालेका नाश, अवश्यंभावी है।


इस लेख के माध्यम से मेरा उद्देश्य किसी की भावनाएँ आहात करने का नही अपितु सत्य की चर्चा करने का है ।

जय हिन्दू राष्ट्र
नमो राघवाय 



11 टिप्‍पणियां:

  1. धर्म की अच्छी व्याख्या की है। धर्म का पालन करना ही धर्म है। धर्म प्रणवाक्षर ओम् की तरह पवित्र और सनातन है।

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    1. धन्यवाद बंधुवर !!
      आपको यह प्रयास अच्छा लगा यह जानकर खुशी हुई।

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  2. धर्म = सत्य / न्याय + नीति
    अधर्म = धर्म का विपरित

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    1. धर्म अर्थात् सत्य / न्याय और नीति
      अधर्म अर्थात् जो धर्म के विपरीत हो
      गीता के अनुसार धर्म की हानि अर्थात् सत्य / न्याय एवं नीति का न होना

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    2. श्रीमद्भागवत महापुराण के द्वादश स्कन्द के तृतीय अध्याय के अनुसार,
      धर्म के चार चरण होते हैं; वे चरण हैं—
      १. सत्य,
      २. दया,
      ३. तप और
      ४. दान

      जहां ये चारों विद्यमान होते है वहाँ धर्म रहता है।

      इसी प्रकार अधर्म के भी चार चरण बताये गए है, वे चरण निम्नवत हैं—
      १. असत्य
      २. हिंसा,
      ३. असन्तोष और
      ४. कलह

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  3. शास्त्रो में तीन शब्द प्रयुक्त हुए है :-
    धर्म :- वेदों/शास्त्रों द्वारा बताया गया मार्ग,
    अधर्म :- धर्म मार्ग से अन्य
    विधर्म :- धर्म मार्ग के विपरीत

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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    1. यह बहुत उपयोगी है और अच्छा भी।

      मैं ऐसी हीं परिभाषा खोज रहा था।

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